सोनपुर मेला

सोनपुर मेला, जिसे हरिहर क्षेत्र मेला भी कहा जाता है, बिहार राज्य के सारण ज़िले में गंगा और गंडक नदियों के संगम तट पर प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला भारत का एक प्राचीन, भव्य और विश्व-प्रसिद्ध मेला है। यह मेला कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर शुरू होता है और परंपरा के अनुसार कई दिनों तक चलता है। सोनपुर मेले का इतिहास, इसकी सांस्कृतिक समृद्धि, धार्मिक आस्था और पशु व्यापार की अनूठी परंपरा इसे पूरे एशिया में विशिष्ट बनाती है।


ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

सोनपुर मेले का इतिहास हजारों वर्ष पुराना माना जाता है। लोककथाओं के अनुसार, इस स्थान पर भगवान विष्णु ने गज–ग्राह युद्ध में गजेन्द्र को मोक्ष प्रदान किया था, जिसके कारण इसे “हरिहर क्षेत्र” कहा जाने लगा।
इतिहासकारों का मानना है कि मौर्य और गुप्त काल में भी यह मेला अत्यंत महत्वपूर्ण था। कहा जाता है कि सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य अपने विशाल अश्वदल के लिए यहीं से घोड़े खरीदते थे।


धार्मिक महत्व

सोनपुर मेला केवल व्यापारिक आयोजन ही नहीं, बल्कि धार्मिक दृष्टि से भी अत्यंत पवित्र माना जाता है।

  • कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा–गंडक संगम में स्नान करना शुभ माना जाता है।
  • यहाँ स्थित हरिहरनाथ महादेव मंदिर में श्रद्धालुओं का विशाल जनसमूह पूजा-अर्चना के लिए पहुँचता है।
  • मेले के दौरान भजन-कीर्तन, साधु-संतों के प्रवचन और धार्मिक समारोह लगातार चलते रहते हैं।

पशु मेला – एशिया का सबसे बड़ा पशु बाज़ार

सोनपुर मेले की सबसे बड़ी पहचान इसका विशाल पशु बाजार है। परंपरागत रूप से यहाँ विभिन्न प्रकार के पशुओं की खरीद–फरोख्त होती थी, जैसे:

  • हाथी – कभी यह एशिया का सबसे बड़ा हाथी बाजार माना जाता था।
  • घोड़े – राजस्थान, उत्तर प्रदेश, पंजाब आदि से विशेष नस्लों के घोड़े लाए जाते हैं।
  • गाय–भैंस, बैल, ऊँट – कृषि और भार ढोने वाले पशुओं का बड़ा व्यापार होता था।
  • अन्य पशु–पक्षी – विभिन्न नस्लों के पालतू जानवर और पक्षियों की भी बिक्री होती है।

हाल के वर्षों में वन्यजीव संरक्षण कानूनों के कारण हाथियों की खरीद–फरोख्त बंद है, परंतु मेले की प्रसिद्धि आज भी बरकरार है।

सांस्कृतिक और मनोरंजक गतिविधियाँ

सोनपुर मेला ग्रामीण संस्कृति और भारतीय परंपरा का जीवंत मंच है।
यहाँ रात-दिन मनोरंजन और सांस्कृतिक विविधता का अनूठा संगम देखने को मिलता है।


  • लोकनृत्य और लोकगीत कार्यक्रम
  • जादू शो, सर्कस, कठपुतली शो
  • हस्तशिल्प, मिट्टी कला, बांस की कलाकृतियों के स्टॉल
  • ग्रामीण भोजन, मिठाइयाँ और पारंपरिक व्यंजन
  • झूले, खेल और आधुनिक मनोरंजन स्टॉल

यह सब मिलकर मेले को एक अद्भुत उत्सव का रूप प्रदान करते हैं


आर्थिक और सामाजिक महत्व

सोनपुर मेला केवल एक धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन ही नहीं, बल्कि क्षेत्र की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग भी है।

  • हजारों कारीगर, व्यापारी और किसान अपनी आजीविका के लिए इस मेले पर निर्भर रहते हैं।
  • पर्यटन उद्योग को बड़ी मात्रा में लाभ मिलता है।
  • ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों का सांस्कृतिक आदान–प्रदान भी इस मेले में देखने को मिलता है।

पर्यटन और अंतरराष्ट्रीय पहचान

सोनपुर मेला दुनिया भर के यात्रियों और शोधकर्ताओं को आकर्षित करता है।
विदेशी पर्यटक यहाँ भारतीय ग्रामीण जीवन, लोक संस्कृति और धार्मिक आस्था की झलक देखने के लिए बड़ी संख्या में आते हैं।
राज्य सरकार भी पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए मेले में विशेष सुविधाएँ उपलब्ध कराती है, जैसे—टेंट सिटी, सुरक्षा व्यवस्था, डिजिटल टिकटिंग और सांस्कृतिक महोत्सव।

निष्कर्ष

सोनपुर मेला भारतीय परंपरा, संस्कृति, धार्मिक आस्था और ग्रामीण जीवन का अनूठा संगम है।
यह न केवल बिहार की पहचान है, बल्कि भारत की ऐतिहासिक संस्कृति का जीवंत प्रतीक भी है।
समय के साथ इसमें कई बदलाव आए हैं, पर इसकी महिमा और लोकप्रियता आज भी उतनी ही व्यापक है।

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